गर्भपात

 

पहले ट्रिमस्टर के गर्भ का पतन करने के लिए क्या चिकित्सकीय विधियां हैं?

इसमें मुख्यतः प्रोस्टाग्लेन्डिन नामक ड्रग समूह की दवाओं का प्रयोग किया जाता है जिसमें मुख्यतः प्रोस्टाग्लेन्डिन नामक ड्रग समूह की दवाओं का प्रयोग किया जाता है जिसका अनेक मार्गों से उपयोग किया जा सकता है जैसे कि मुख (जिन्हें एबोरशन पिल कहते हैं), इन्टरामस्कुलर, इन्टराबीनस या योनि में इन्जैक्शन द्वारा। इन दवाओं का अकेले अकेले अथवा कुछ दवाओं को मिलाकर दिया जाता है।

 
 
 

(1) मैथोट्रक्सेंट - मिसोप्रोस्टल विधि - महिला को मैथोट्रक्सेट का इन्जैक्शन दिया जाता है। पांच से सात दिन के बाद वह वापिस आती है और उसे योनि में डालने के लिए मिसोप्रोस्टल की गोलियां दी जाती है। एक दो दिन के बाद घर पर ही गर्भ समाप्त हो जाता है। गर्भ के दौरान जो भ्रूण एवं अन्य टिशु पैदा हुए थे वे योनि द्वार से बाहर निकल जाते हैं।

(2) मिफेप्रिस्टोन - मिसोप्रोस्टल विधि - मिफेप्रिस्टोन को आर यू - 486 भी कहते है, यह एन्टीप्रोजेस्ट्रोन होता है। महिला मिफेप्रिस्टोन का एक डोस खाती है पांच से सात दिन में लौटकर अपनी योनि में मिसोप्रोस्टल की गोलियां डालती है। चार घन्टे के अन्दर घर पर ही गर्भ समाप्त हो जाता है। गर्भ के दौरान जो भ्रूण या अन्य टिशु पैदा हुए थे वे योनि द्वार से बाहर निकल जाते हैं।


क्या एबोरशन पिल हमेशा डॉक्टर की देखरेख में ही लेना चाहिए?

हां, एबोरशन पिल हमेशा डॉक्टर की देखरेख में ही लिया जाना जाहिए।

एबौरशन की चिकित्सापरक विधियों से जुड़े खतरे कोन से हैं?

एबौरशन की चिकित्सापरक विधियों से सम्बन्धित खतरों में शामिल है -

1. मिफेप्रिस्टोन, मैथोट्रक्सेट और मिसोप्रोस्टाले से चक्कर आते हैं और उल्टी या डायरिया होता है।

2. यदि गर्भपात पूरी तरह न हो तो भ्रूण को शल्यक्रिया द्वारा निकालना पड़ेगा।

3. भारी रक्त स्राव हो सकता है जो कि सात दिनों तक चल सकता है

4. ये ड्रग आसानी से मिलते नहीं और महंगे होते हैं

दूसरे ट्रिमस्टर में एम टी पी के लिए कौन कौन सी विधियां काम में ली जाती हैं?

उन में चिकित्सापर और शल्यक्रिया परक विधियां शामिल हैं।

दूसरे ट्रिमस्टर में गर्भ का पतन करने के लिए किन चिकित्सापरक विधियों का उपयोग किया जाता है?

चिकित्सापरक विधि में प्रोस्टाग्लेन्डिन सम्बन्धी ड्रग्स का प्रयोग किया जाता है जो कि मुख से या इन्टरावेजनली दिया जाता है या सीधे गर्भशय के छिद्र में इंजैक्शन द्वारा पहुंचाया जातै है।

चिकित्सापरक विधियों से कौन से खतरे जुड़े रहते हैं?

चिकित्सापरक विधियों से जुड़े खतरों में शामिल हैं -

1. रोगी को अस्पताल में तीन दिन तक रहना पड़ता है

2. इन्फैक्शन (संक्रमण)

3. बढ़ा हुआ रक्त स्रावपदार्थों का बच रहना जिन्हें निकालने के लिए शल्य क्रिया की जरूरत पड़ सकती है।

 

दूसरे ट्रिमस्टर के गर्भ का पतन करने के लिए शल्य क्रिया परक किन विधियों की जरूरत होती है?

शल्य चिकित्सापरक विधियों में शामिल हैं।

1.         एसपिरोटमी - यह विस्तृत करके निकाले जाने के सामान है। 

2.         हिस्टरोटोमी : गर्भाशय खोलकर भ्रूण को हटा देना। 

3.         हिस्टरोक्टोमी : पूरे गर्भाशय को हटा देना।

 

गर्भपात के दीर्घकालिक प्रभाव क्या होते हैं?

गर्भपात कराने वाली औरतों को चिन्ता हो जाती है कि इस का भविष्य में गर्भधारण करने या बच्चे को जन्मने की उनकी सामर्थ्य में कमी आ जायेगी। उन्हें यह जानकर प्रसन्नता होगी कि अब सामान्यतः यह माना जाता है कि 12 हफ्ते के गर्भ में अगर एक गर्भ का पतन कराया जाए तो भविष्य में गर्भ धारम कर पाने की योग्यता में कोई कमी नहीं होती। हाल ही में वर्ल्ड हैल्थ आरगनाइजेशन द्वारा कराये गए एक अध्ययन से पता चला है कि जिन औरतों के दो-तीन गर्भपात कराये जाते हैं उनके प्राकृतिक गर्भ पतन की अपरिपक्व प्रसव या जन्म के समय बच्चे के कम वजन की आशंकाएं दो तीन गुना बढ़ जाती हैं।

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