हार्मोन्स किस प्रकार हमारे यौन-जीवन को प्रभावित करता है?

सेक्स संबंधों के दौरान हमारे यौन-जीवन को चार प्रकार के हार्मोन्स प्रभावित करते हैं। ये हैं 1. ऑक्सीटोसिन हार्मोन 2. वैसोप्रेसिन हार्मोन 3. फेनाइलेथैलामाइन हार्मोन 4. टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन

ऑक्सीटोसिन हार्मोन का यौन-जीवन (सेक्स संबंधों) एवं शरीर पर प्रभाव -
           शरीर वैज्ञानिकों द्वारा ऑक्सीटोसिन हार्मोन का शोध करने पर पता चला है कि शरीर में मौजूद यह हार्मोन एक गोंद की तरह होता है जो स्त्री-पुरुष को एक साथ रहने के लिए मन में लगाव पैदा करता जो एक-दूसरे की ओर आकर्षित होने के लिए मस्तिष्क को उत्तेजित करता है। ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का मानव जीवन के लिए बेहद महत्व है क्योंकि स्त्रियों के स्तनों में दूध बनाने का कार्य भी इस हार्मोन के द्वारा ही होता है। सेक्स वैज्ञानिकों के अनुसार सेक्स क्रिया के बाद लिंग की उत्तेजना शांत होने पर उसे फिर से उत्तेजित करने का कार्य भी ऑक्सीटोसिन हार्मोन का होता है। इस विषय में शोध करने वालों का कहना है कि मादा जानवर भी उस नर जानवरों के साथ ही हॉटपीरियड में सेक्स संबंध बनाना पसंद करती हैं जिसमें ऑक्सीटोसिन का स्तर अधिक हो। ऑक्सीटोसिन का निर्माण पिट्युटरी ग्रंथि में होता है लेकिन कुछ शोध कार्यो में इसकी कुछ मात्रा मस्तिष्क की न्यरॉन रचनाओं में देखी गयी है।

 
 
 

वैसोप्रेसिन हार्मोन का यौन-जीवन एवं शरीर पर प्रभाव -
           वैसोप्रेसिन को ऑक्सीटोसिन हार्मोन का सहायक हार्मोन कहा जाता है। शरीर विज्ञान के अनुसार ऑक्सीटोसिन हार्मोन द्वारा शुरू किए गए कार्य को पूरा करने का कार्य वैसोप्रेसिन हार्मोन करता है। मनुष्य के शरीर में यही वह हार्मोन है जो स्त्री को पत्नी और पुरुष को पति होने का अहसास कराता है। जानवरों के शरीर में मौजूद यही हार्मोन अपनी साथी के चुनाव करने में मदद करता है।

फेनाइलेथैलामाइन हार्मोन का यौन-जीवन एवं शरीर पर प्रभाव -
           वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे शरीर में एक जैव सक्रिय रसायनिक हार्मोन होता है जिसे फेनाइलेथैलामाइन कहते हैं। शरीर में मौजूद यह रसायन ही हमारे मूड अर्थात इच्छाओं में बदलाव लाने का कार्य करता है। स्त्री-पुरुष के मन में सेक्स संबंध के लिए जो इच्छा और उत्तेजना उत्पन्न होती है वह भी फेनाइलेथैलामाइन हार्मोन के द्वारा ही होती है। सेक्स के दौरान स्त्री-पुरुष में उत्तेजना, कामुक भावना और उन्मादित सेक्स इच्छा को पैदा करने का कार्य भी फेनाइलेथैलामाइन हार्मोन करता है।

टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का यौन-जीवन एवं शरीर पर प्रभाव -
शरीर का अध्ययन करने वाले कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का निर्माण व्यक्ति के शरीर में युवावस्था शुरू होने के साथ ही होने लगता है जबकि कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का निर्माण गर्भ में ही होने लगता है जो युवावस्था की शुरुआत के समय इसकी कार्यशीलता तेज हो जाती है जिससे किशोर-किशोरियां देखते-देखते ही युवक-युवती में बदल जाते हैं।
शरीर विकास की बाते करें तो किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश करने की प्रक्रिया 10 से 12 वर्ष की आयु से ही शुरू हो जाती है। इस आयु में हायपोथेलेमस और पिट्युटरी ग्रंथियां में विशेष प्रकार के हार्मोन उत्पन्न होने लगते हैं जिसे टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन कहते हैं और इस हार्मोन से शरीर में यौनांगों का विकास होने लगता है। इस हार्मोन के विकास के कुछ समय बाद ही कुछ अन्य हार्मोन का भी निर्माण शुरू हो जाता है जो शरीर के विकास के क्रम को बढ़ा देता है। एक अध्ययन से पता चला है कि किशोरावस्था में लड़कों ने टेस्टोस्टेरॉन का स्तर लड़कियों की तुलना में 20 गुना अधिक रहता है। टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन की उत्पत्ति लड़कों के अंडकोषों में होता है और लड़कियों के अधिवृक्क ग्रंथि में होता है।

 

 

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