'टू फिंगर' टेस्ट ( रेप टेस्ट ) पर रोक

बलात्कार पीडि़तों की मानसिक पीड़ा को समझते हुए सरकार ने इलाज और जांच के लिए नई गाइडलाइन जारी की है। स्वाीस्य्या मंत्रालय ने 'टू फिंगर' टेस्ट पर रोक लगा दी है। नए दिशा निर्देश के अनुसार इसे अवैज्ञानिक और गैर-कानूनी करार दिया गया है। अस्पतालों से कहा गया है कि वे पीडि़तों की फॉरेंसिक और मेडिकल जांच के लिए अलग से कमरे की व्यवस्था करें। मंत्रालय ने टू-फिंगर टेस्ट को अवैज्ञानिक बताते हुए इस पर पाबंदी लगा दी है. इसमें डॉक्टर दो अंगुलियों के प्रयोग से यह जानने की कोशिश करते थे कि क्या पीड़िता शारीरिक संबंधों की आदी रही है. डॉक्टरों को पीड़ित को यह भी बताना होगा कि कौन-कौन से मेडिकल टेस्ट किए जाएंगे और कैसे किए जाएंगे. ये सारी बातें डॉक्टरों को पीड़ित को उस भाषा में समझानी होगी जो उसे समझ में आती हो. बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए हैं. ऐसा विश्वास किया जा रहा है कि इससे बलात्‍कार पीडि़ता की 'मानसिक पीड़ा' बढ़ने पर रोक लगेगी।
डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च (डीएचआर) ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के साथ मिलकर विशेषज्ञों की मदद से आपराधिक मामलों से निपटने के लिए राष्ट्रीय दिशा निर्देश तैयार किया है। डीएचआर ने यौन हिंसा के मानसिक-सामाजिक प्रभाव से निपटने के लिए भी एक नई नियमावली बनाई है। ये नियम उन सभी हेल्थ केयर प्रोवाइडर्स को उपलब्ध कराए जाएंगे, जो यौन हिंसा पीड़ितों की जांच और देखभाल करते हैं।   
आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ. वी एम कटोच ने नवंबर 2011 में विशेषज्ञों का एक समूह बनाया था। डॉ. एम ई खान की अध्यक्षता में बने समूह को ऐसे दिशा निर्देश बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। जिसका पालन किसी भी बलात्कार पीड़ित के स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में पहुंचने पर किया जाना है। इसके बाद क्लीनिकल फॉरेंसिक मेडिकल यूनिट (सीएफएमयू) प्रभारी इंद्रजीत खांडेकर को भी दिशानिर्देश बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। 
 

क्‍या है नए दिशा निर्देश........ 
1. अब तक बलात्कार पीड़ितों की जांच केवल पुलिस के कहने पर की जाती थी, लेकिन अब यदि पीड़ित पहले अस्पताल आती है तो एफआईआर के बिना भी डॉक्टरों को उसकी जांच करनी चाहिए।
 2. डॉक्टरों से 'रेप' शब्द का इस्तेमाल नहीं करने को कहा गया है, क्योंकि यह मेडिकल नहीं कानूनी टर्म है।
3.  अस्पतालों को रेप केस में मेडिको-लीगल मामलों (एमएलसी) के लिए अलग से कमरा मुहैया कराना होगा और उनके पास गाइड लाइंस में बताए गए आवश्यक उपकरण होना जरूरी है। 
4. पीड़ित को वैकल्पिक कपड़े उपलब्ध कराने की व्यवस्था होनी चाहिए और जांच के वक्त डॉक्टर के अलावा तीसरा व्यक्ति कमरे में नहीं होना चाहिए। 
5. यदि डॉक्टर पुरुष है तो एक महिला का होना आवश्यक है।  
6.  डॉक्टरों द्वारा किए जाने वाले 'टू फिंगर' टेस्ट को गैर कानूनी बना दिया गया है। नियमावली में माना गया है कि यह वैज्ञानिक नहीं है और इसे नहीं किया जाना चाहिए।  
7. डॉक्टरों को पीड़ित को जांच के तरीके और विभिन्न प्रक्रियाओं की जानकारी देनी होगी और जानकारी ऐसी भाषा में दी जानी चाहिए, जिन्हें मरीज समझ सके।

नए दिशा-निर्देशों के अनुसार डॉक्टरों और अस्पताल के अन्य कर्मचारियों को ऐसे मामलों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए. डॉक्टरों को बलात्कार शब्द का प्रयोग करने के लिए भी मना किया गया है क्योंकि 'बलात्कार' पारिभाषिक क़ानूनी शब्दावली का शब्द है. मेडिकल टेस्ट में इसका जिक्र करना ज़रूरी नहीं. पहले बलात्कार पीड़ित का मेडिकल टेस्ट पुलिस की मांग पर ही किया जाता था. अब यदि पीड़ित पुलिस में एफआईआर कराने से पहले अस्पताल जाती है तो डॉक्टरों को उसका परीक्षण करना चाहिए. बलात्कार पीड़ित की चिकित्सा शुरू करने से पहले उसकी पूरी तरह से समझ-बूझ कर दी गई सहमति ज़रूरी होगी. इसके बाद उन्हें पुलिस को सूचित करना होगा. अगर पीड़ित की उम्र 12 साल से कम है या वह सहमति देने की स्थिति में नहीं है तो यह सहमति उसके अभिभावकों से लेनी होगी.

 

 
 

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