प्रसव पूर्व सावधानी

 

प्रसव पूर्व देखभाल का संबंध गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली स्वास्थ्य की जानकारी और नियमित चिकित्सा जांच से होता है जिससे कि प्रसव सुरक्षित हो सके। मातृत्व अस्वस्थता और मातृ मृत्यु के मामलों की पहले ही जांच और चिकित्सा कर इन मामलों में कमी लायी जा सकती है। गंभीर खतरों वाली गर्भावस्था और उच्च प्रसव वेदना की छानबीन के लिए "ए एन सी" भी आवश्यक है। प्रसव पूर्व सावधानी के महत्वपूर्ण अंगों पर आगे विचार किया जा रहा है -

 

 
 
 

समय-पूर्व पंजीकरण

जैसे ही गर्भाधान की संभावना का पता चले, गर्भवती महिला को प्रसव पूर्व देखभाल के लिए पहली बार जाकर नाम दर्ज कराना चाहिए। प्रजनन आयु की प्रत्येक विवाहित महिला को स्वास्थ्य केन्द्र में जाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए अथवा महिला के स्वयं गर्भवती महसूस करने पर इसकी सूचना देनी चाहिए। आदर्श रूप में पहली बार गर्भाधान की प्रथम तिमाही (गर्भाधान की प्रथम तिमाही) अथवा 12 सप्ताह से पहले स्वास्थ्य केन्द्र पर जाना चाहिए। तथापि, यदि कोई महिला गर्भाधान की आखिरी अवधि में केंद्र पर आती है तो उसको पंजीकरण कर लेना चाहिए और गर्भाधान की आयु के अनुसार सहायता मुहैया करानी चाहिए।

 


समय-पूर्व पंजीकरण का महत्व

मां के स्वास्थ्य का आकलन तथा रक्तचाप और वजन आदि के संबंध में आधारभूत जानकारी प्राप्त की जा सके।

जटिलताओं से शीघ्र निपटा जा सके तथा आवश्यक होने पर निर्णय के लिए भेजकर समुचित प्रबंध किया जा सके।

महिला को अपने मासिक-धर्म की अवधि की तारीख याद करने में सहायता करनी  चाहिए।

महिला को टी टी इंजेक्शन की पहली खुराक समय के अंदर ही देनी चाहिए (गर्भाधान के 12 सप्ताह के अंदर)

शीघ्र और सुरक्षित गर्भपात की सुविधाओं के लिए सहायता करें (यदि महिला गर्भ नहीं रखना चाहती हो)

 

स्वास्थ्य परीक्षा

वजनः जब भी गर्भवती महिला स्वास्थ्य परीक्षा के लिए जाती है तो उसके वजन की जांच करनी चाहिए। सामान्यतया गर्भवती महिला का वजन 9 से 11 कि. ग्राम तक बढ़ जाना चाहिए। पहली तिमाही के पश्चात गर्भवती महिला का वजन 2 किलो ग्राम प्रति माह अथवा 0.5 प्रति सप्ताह बढ़ना चाहिए। यदि आवश्यक कैलोरी की मात्रा से खुराक पर्याप्त नहीं हो तो महिला अपनी गर्भावस्था के दौरान 5 से 6 किलो ग्राम वजन ही बढ़ा सकती है।  यदि महिला का वजन प्रतिमाह 2 किलो ग्राम से कम बढ़ता हो, तो अपर्याप्त खुराक समझनी चाहिए। उसके लिए अतिरिक्त खाद्य आवश्यक होता है। वजन कम बढ़ने से गर्भाशय के अंदर गड़बड़ी का अंदेशा होता है और वह कम वजन वाले बच्चे के जन्म में परिणत होता है। अधिक वजन बढ़ने (> 3 किलो ग्राम प्रतिमाह) से प्री एक्लेम्पसिया/जुड़वां बच्चों की संभावना समझनी चाहिए। उसको चिकित्सा अधिकारी के पास जाँच के लिए भेजना चाहिए।

 

ऊंचाईः

मातृवंश और प्रसव परिणाम के बीच संबंध है, कम से कम कुछ अंश तक क्योंकि बहुत ही कम ऊंचाई वाली स्त्री की श्रोणि (पेल्विस) छोटी होने के कारण इसका जोखिम बढ़ जाता है। ऐसी स्त्रियां जिनकी ऊंचाई 145 सेंटी मीटर से कम होती है, उनमें प्रसव के समय असामान्यता होने की अधिक संभावना होती है और अति खतरा संवेदी महिला समझी जाती है तथा उसके लिए अस्पताल में ही प्रसव की सिफारिश की जाती है।

 

रक्त चापः

गर्भवती महिला के रक्तचाप की जाँच बहुत ही महत्वपूर्ण होता है जिससे कि गर्भाधान के दौरान अति तनाव का विकार न होने पाए। यदि रक्तचाप उच्च हो (140-90 से अधिक अथवा 90 एमएम से अधिक डायलेटेशन) और मूत्र में अल्बूमिन की मात्रा पाई जाए तो महिला को प्री-एक्लेम्पसिया कोटि में मान लेना चाहिए। यदि डायास्टोलिक की मात्रा 110 एम एम एच जी से अधिक हो तो उसे तत्काल गंभीर बीमारी की निशानी माना जाएगा। इस प्रकार की महिला को तत्काल सीएचसी/एफ आर यू में जाँच के लिए भेज देना चाहिए। गर्भवती महिला जो कि तनाव (पी आई एच) / पी एकलेम्पसिया से प्रभावित हो उसको अस्पताल में प्रवेश कराने की आवश्यकता होती है।

 

पैलोरः

यदि महिला के निचले पलक की जोड़, हथेली और नाखून, मुंह का कफ और जीभ पीले हों तो उससे यह संकेत मिलता है कि महिला में खून की कमी है।

 

श्वसन क्रिया की दर (आर आर):

विशेषरूप से यदि महिला सांस न ले सकने की शिकायत करती हो तो श्वसन क्रिया की जांच करना अति महत्वपूर्ण है। यदि श्वसन क्रिया 30 सांस प्रति मिनट से अधिक हो और कफ उत्पन्न होता हो तो यह संकेत मिलता है कि महिला को खून की भारी कमी है तथा उसे डॉक्टर के पास जांच के लिए भेजना अत्यावश्यक है।

 

सामान्य सूजनः

चेहरे पर सांस फूलने को सामान्य सूजन होना माना जाता है तथा इससे प्री एक्लेम्पसिया होने की संभावना समझनी चाहिए।

 

उदरीय परीक्षाः

गर्भ और भ्रूण में वृद्धि और भ्रूण न होने तथा होने पर निगरानी रखने के लिए उदरीय परीक्षा करनी चाहिए।

 

लौह फोलिक अम्ल (आई एफ ए) की आपूर्तिः

गर्भवती महिलाओं को खून की कमी के खतरों से बचाने के लिए गर्भावस्था के दौरान अधिकाधिक लौह की आवश्यकता पर जोर डालें। सभी गर्भवती महिलाओं को गर्भाधान के बाद की पहली तिमाही अर्थात 14 से 16 सप्ताह से प्रतिदिन आई एफ ए (100 एम जी मौलिक लौह और 0.5 एम जी फोलिक एसिड) की एक गोली 100 दिन तक देने की आवश्यकता होती है। आई एफ ए की यह मात्रा खून की कमी (प्रोफाइलेक्टिक खुराक) को रोकने के लिए दी जाती है। यदि किसी महिला में खून की कमी हो (एच बी<जी/डीएल) या उसको पैलोर हो तो उसे तीन माह तक आई एफ ए की 2 गोलियों की मात्रा प्रतिदिन देते रहें। इसका यह आशय हुआ कि गर्भवती महिला को गर्भावस्था के दौरान आई एफ ए की कम से कम 200 गोलियां देने की आवश्यकता होती है। आई एफ ए गोलियों की यह मात्रा अत्यधिक खून की कमी वाली(एच बी<7जी/डीएल) अथवा सांस न ले सकने वाली और खून की कमी के कारण चिड़-चिड़ाहट महसूस करने वाली महिलाओं को (स्वास्थ्यकर मात्रा) स्वस्थ बनाने के लिए आवश्यक होती है। इन महिलाओं को आई एफ ए की स्वास्थकर मात्रा आरंभ कर और आगे अगली देखभाल के लिए संबद्ध डॉक्टर के पास सलाह के लिए भेजना चाहिए।

 

टेटनस टोक्साईड का इंजेक्शन देनाः

नवजात शिशु की टेटनस से रोकथाम के लिए टी टी इंजेक्शन की 2 मात्रा देना बहुत ही महत्वपूर्ण है। टी-टी इंजेक्शन की पहली खुराक पहली तिमाही के ठीक बाद में या जैसे ही कोई महिला ए एन सी के लिए अपना नाम दर्ज कराए, जो भी बाद में हो, देनी चाहिए।  गर्भाधान की पहली तिमाही के दौरान टी टी इंजेक्शन नहीं देना चाहिए। पहली खुराक के एक माह बाद ही अगली इंजेक्शन की खुराक देनी चाहिए किंतु ई डी डी से एक माह पहले ही।

 

सुरक्षित मातृत्व

 

top women in the world