स्त्री मनोविज्ञान का समाजशास्त्रीय विश्लेषण

भारतीय समाज में अब तक पुरुषों की ऐसी पारंपरिक छवि बसी हुई थी, जिसमें पुरुषों के रौबदार, रफ-टफ, दबंग और गंभीर व्यक्तित्व की सराहना की जाती थी। पुराने समय की स्त्रियां ऐसे पुरुषोचित्त गुणों से परिपूर्ण पुरुषों के व्यक्तित्व के प्रति आकर्षित होती थीं। लेकिन आज महानगरों का मध्यवर्गीय समाज बहुत तेजी से बदल रहा है। युवा पीढी की लडकियां पुरुषों की इस पारंपरिक छवि से अलग हटकर मेट्रोसेक्सुअल पुरुषों को ज्यादा पसंद करती हैं, जिसका अर्थ महानगरों में रहने वाले ऐसे पुरुषों से है, जिनके पास खर्च करने के लिए बहुत सारा धन होता है और जो अपने व्यक्तित्व को निखारने और संवारने के प्रति अतिशय जागरूक होते हैं।

इसके लिए वे जिम, हेल्थ क्लब, पार्लर जाना, स्टाइलिश ब्रैंडेड आउटिफट्स पहनना जरूरी समझते हैं और अपने बाहरी और आंतरिक व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने में विश्वास रखते हैं। इतना ही नहीं, ऐसे पुरुष भारतीय पुरुष की पारंपरिक छवि को सिरे से खारिज करते हुए यूरोपीय देशों की पुरुषों की तरह कुकिंग, घर की सफाई और बच्चों की नैपी बदलने जैसे काम करने का भी भरपूर लुत्फ उठाते हैं।

 

 

स्पोर्टस, म्यूजिक और डांस में रुचि में रखने वाले युवा पीढी के ऐसे पुरुषों का सेंस ऑफ हृयूमर लडकियों को बहुत आकर्षित करता है।

इंसान जिस समाज में रहता है, वहां की स्थितियों से उसके संबंध निश्चित रूप से प्रभावित होते हैं। जहां तक प्रेम संबंध में स्त्री की अपेक्षाओं का सवाल है तो इस संदर्भ में समाज के हर वर्ग की स्त्री की उम्मीदें अलग होती हैं। उदाहरण के लिए निम्नवर्गीय समाज में रहने वाली स्त्री अपने प्यार में भी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा को भावनात्मक सुरक्षा की तुलना में ज्यादा अहमियत देती है, क्योंकि उसके लिए रोटी, कपडा और मकान जैसी जिंदगी़ की बुनियादी जरूरतें पूरी कर पाना ही इतनी बडी बात होती है कि अपनी दूसरी जरूरतों की ओर उसका ध्यान जाता ही नहीं। अगर उसका साथी उसकी इन जरूरतों को भी अच्छी तरह पूरा करता है तो इसी से वह संतुष्ट और खुश रहती है। मध्यम वर्ग की स्त्री चाहती है कि उसका साथी उसकी भौतिक जरूरतों के साथ उसकी भावनात्मक मांगों को भी अच्छी तरह पूरा करे और उसके साथ बेहतर संवाद बनाए रखे।

 

उच्चवर्ग के पास जीवन के लिए सभी जरूरी सुख-सुविधाएं मौजूद होती हैं लेकिन समाज के इस तबके पास सबसे बडी समस्या है-समय का अभाव। इस वजह से स्त्री-पुरुष के रिश्ते में अकसर संवादहीनता की स्थिति आ जाती है। इस वजह से यहां स्त्री की सबसे बडी चाहत यह होती है कि जिस किसी पुरुष से वह प्रेम करती है, वह उसे पूरा समय दे, उससे बातचीत करे, उसकी भावनात्मक और शारीरिक जरूरतों को अच्छी तरह समझे।

आज की शिक्षित मध्यवर्गीय भारतीय स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई है, वह जागरूक है और जिंदगी़ के प्रति उसका नजरिया बदल गया है। अब उसमें इतना आत्मविश्वास आ गया है कि वह अपनी शारीरिक जरूरतों को भी स्वीकारने लगी है, पहले की तरह वह अपना पूरा जीवन इस इंतजार में नहीं बिता सकती कि शायद उसका जीवनसाथी कभी तो उसकी इस जरूरत को समझेगा। आज की औरत अपनी सेक्सुअलिटी को पहचानने लगी है, यह अपने आप में बहुत बडा सामाजिक बदलाव है। यही वजह है कि आज तलाक की घटनाएं बढ रही हैं। पहले सिर्फ अपने वैवाहिक जीवन से नाखुश पुरुषों के ही विवाहेत्तर संबंध होते थे, लेकिन आज वैसी स्त्रियों के भी विवाहेत्तर संबंध बन रहे हैं, जिनके दांपत्य जीवन में प्यार की कमी है। यह सही है या गलत, यह बहस का एक अलग मुद्दा हो सकता है, लेकिन यह एक सहज सामाजिक बदलाव है और इस सच्चाई से हम ज्यादा समय तक नजरें नहीं चुरा सकते। अपने संबंधों को लेकर आज की स्त्री ज्यादा परिपक्व और भावनात्मक रूप से मजबूत है। अपने दांपत्य जीवन को अच्छी तरह चलाने के लिए आधुनिक स्त्री पहले की तरह आज भी काफी हद तक अपने आत्मसम्मान का त्याग करती है। भारत में विवाह संस्था सिर्फ स्त्री की वजह से ही टिकी हुई है।

आज की स्त्री निर्भीक और आत्मविश्वासी है। इस वजह से पहले की तुलना में आज वह अपने रिश्ते को लेकर ज्यादा ईमानदार है। अपने संबंध को बचाए रखने के लिए वह अपने बलबूते पर समाज से लडती है। पुराने समय में लडकियां दब्बू और डरपोक स्वभाव की होती थीं, साथ ही उन पर परिवार और समाज का प्रतिबंध भी ज्यादा होता था। अगर वे किसी से प्यार भी करती थीं तो उनका यह प्यार बहुत दबा-ढका होता था अकसर उनके मन में प्रेम को लेकर अपराधबोध की भावना होती थी कि माता-पिता की मर्जी के खिलाफ वे जो कुछ भी कर रही हैं, वह गलत है। अगर माता-पिता ज्यादा सख्ती से पेश आते और लडकी की शादी कहीं और तय कर देते तो उसका प्यार परवान चढने से पहले ही दम तोड देता था। जहां तक प्यार के लिए समाज से लडने की बात है तो इसकी जिम्मेदारी लडके की ही मानी जाती थी पर आज की स्त्री अपने प्यार को छिपाती नहीं और उसे हासिल करने के लिए वह खुद तैयार रहती है। इस संबंध में एक विज्ञापन एजेंसी की कॉपी राइटर मारिया लोला कहती हैं, मैं अपने कलीग से प्यार करती हूं और हर सामाजिक समारोह में मैं उसके साथ ही जाती हूं। शुरुआत में मेरे घर वालों ने मेरे इस निर्णय का बहुत विरोध किया और क्योंकि उनकी नजर में शादी से पहले हमारा साथ घूमना-फिरना आपत्तिजनक था। पर मेरा मानना है कि किसी से प्यार करना कोई गुनाह नहीं है, जिसे लोगों से छिपाया जाए। धीरे-धीरे मेरे माता-पिता को यह बात समझ आ गई और अब वे मेरी शादी के लिए भी रजामंद हो गए हैं।

वक्त के साथ बदलता नजरिया
प्रेम एक शाश्वत भावना है, जो सदैव बनी रहती है। फिर भी बदलते वक्त के साथ प्रेम को लेकर स्त्री के विचारों में काफी बदलाव आया है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.पामेला सैद्र कहती हैं, आधुनिक मध्यवर्गीय स्त्री का जीवन अति व्यस्त और कशमकश से भरा हुआ है। पहले वह घर की चारदीवारी में कैद रहती थी, इस वजह से उसकी इच्छाएं भी बहुत सीमित थीं और अपने बंद दायरे में भी वह खुश और संतुष्ट रहती थी। पहले बाहर की दुनिया से वह बेखबर थी लेकिन आज की शिक्षित और कामकाजी स्त्री के अनुभवों का दायरा पहले की तुलना में काफी विस्तृत है। ऐसी स्थिति में अब उसे समाज को ज्यादा करीब से देखने और समझने का अवसर मिला है। अब वह अपने जीवन की तुलना दूसरी स्त्रियों से आसानी से कर सकती है। आज पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का जीवन ज्यादा तेजी से बदला है। पहले की तुलना में उसके संबंधों में ज्यादा उथल-पुथल देखने को मिलता है। आज स्त्रियों के प्रेम में समर्पण की भावना खत्म होती जा रही है, इसी वजह से चाहे प्रेम हो या शादी उनके किसी भी रिश्ते के स्थायित्व के लिए खतरा पैदा हो गया है। लेकिन इसका एक सकारात्मक पहलू यह भी है पहले स्त्री के पास जीवन जीने का कोई विकल्प नहीं होता था। अगर उसका दांपत्य जीवन बहुत दुखमय हो तो भी उसके पास शोषण और प्रताडना झेलने के सिवा कोई चारा नहीं होता था। पहले विधवा या परित्यक्ता स्त्रियों की दोबारा शादी नहीं हो पाती थी, पर अब ऐसा नहीं है। अगर प्रेम की कमी की वजह से अगर किसी स्त्री के जीवन में सूनापन है तो वह नए सिरे से अपनी जिंदगी़ की शुरुआत करके आसानी से इस सूनेपन को दूर कर सकती है। यह स्त्री के जीवन में आने वाला सकारात्मक बदलाव है, जिसकी सराहना की जानी चाहिए। प्यार एक ऐसा खूबसूरत एहसास है, जो हर इंसान के दिल के किसी न किसी कोने में बसा होता है। इस एहसास के जागते ही कायनात में जैसे चारों ओर हजारों फूल खिल उठते हैं जिंदगी को जीने का नया बहाना मिल जाता है। स्त्री के जीवन में प्यार बहुत मायने रखता है। प्यार उसकी सांसों में फूलों की खुशबू की तरह रचा-बसा होता है, जिसे वह ताउम्र भूल नहीं पाती।

शायद जब इस संसार की रचना हुई होगी और धरती पर पहली बार आदम और हौवा ने धरती पर कदम रखा होगा, तभी से औरत ने आदमी के साथ मिलकर जिंदगी़ मुश्किलों से लडते हुए साथ मिलकर रहने की शुरुआत की होगी और वहीं से उसके जीवन में पहली बार प्यार का पहला अंकुर फूटा होगा। प्रेम एक ऐसी अबूझ पहेली है, जिसके रहस्य को जानने की कोशिश में जाने कितने प्रेमी दार्शनिक, कवि और कलाकार बन गए। एक बार प्रेम में डूबने के बाद व्यक्ति दोबारा उससे बाहर नहीं निकल पाता। स्त्रियों का प्रेम पुरुषों के लिए हमेशा से एक रहस्य रहा है। कोई स्त्री प्यार में क्या चाहती है, यह जान पाना किसी भी पुरुष के लिए बहुत मुश्किल और कई बार तो असंभव भी हो जाता है।

व्यक्तित्व की जटिलता

शायद रहस्य को ढूंढने के उधेडबुन से परेशान होकर ही किसी विद्वान पुरुष ने संस्कृत के इस श्लोक की रचना की होगी- स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्य:।

पुरुषों के बीच प्रचलित यह पुराना जुमला- प्रेम के मामले में औरत के ना का मतलब हां होता है, भी पुरुषों द्वारा स्त्री के व्यक्तित्व को न समझ पाने की व्यथा को ही दर्शाता है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर स्त्रियां के मन की थाह लेना पुरुषों के लिए इतना मुश्किल क्यों है? इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, दरअसल स्त्री का मनोविज्ञान कुछ ऐसा होता है कि वह अपनी भावनाओं का इजहार करने के प्रति अत्यधिक सचेत होती है। इसकी सबसे बडी वजह यह है कि भारतीय समाज बचपन से ही लडकियों की परवरिश इस तरह की जाती है कि वे अपने व्यवहार की छोटी-छोटी बातों को लेकर बहुत सतर्क रहती हैं। उन्हें बचपन से कम बोलना सिखाया जाता है। इस वजह से ज्यादातर लडकियां अंतर्मुखी और शर्मीली होती हैं और प्यार के मामले में भी वे स्वयं अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के बजाय वे इस बात की उम्मीद रखती हैं कि उनका ब्वॉय फ्रेंड या प्रेमी स्वयं उसकी भावनाएं समझने की कोशिश करे।

क्या कहता है स्त्री मनोविज्ञान

स्त्रियों को हमेशा से ऐसे पुरुष आकर्षित करते हैं, जो स्वयं शारीरिक और मानसिक रूप से इतने मजबूत और सक्षम हों कि वे उन्हें सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक तीनों स्तरों पर सुरक्षा दे सकें, उनकी जरूरतों का खयाल रखें। साथ ही वे दोस्ताना व्यवहार करने वाले खुशमिजाज इंसान हों, जिनके साथ वे बेतकल्लुफ हो कर अपने दिल की बातें शेयर कर सके। अकसर हम जिन्हें छोटी-छोटी बातें समझकर नजरअंदाज कर देते हैं वे हमारी जिंदगी़ की खुशियों को बरकरार रखने के लिए बहुत जरूरी होती हैं। पारंपरिक भारतीय समाज में हमेशा पत्नी से ही उम्मीद की जाती है कि वह अपने पति की हर छोटी-छोटी जरूरतों का खयाल रखे, जैसे-पति ने खाना खाया या नहीं, उनके कपडे प्रेस हुए या नहीं, उनके मोबाइल का बिल जमा हुआ या नहीं। ऐसे में घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारियां साथ-साथ निभाते हुए पत्नी थक जाती है। ऐसी स्थिति में अगर कभी पति सिर्फ इतना ही कह दे कि, तुम थक गई होगी, रहने दो यह काम मैं खुद कर लूंगा, तो उनके द्वारा कही गई इस छोटी-सी बात से ही पत्नी की सारी थकान दूर हो जाती है और यह एहसास किसी किसी भी औरत के लिए बहुत मायने रखता है कि मैं जिससे प्यार करती हूं, उसे भी मेरी फिकर रहती है।

चाहती है अपना कोना

प्रेम या दांपत्य संबंधों के मामले में युवा पीढी की सोच में एक नया बदलाव नजर आ रहा है। आज की शिक्षित और आत्मनिर्भर युवा स्त्री को अपनी व्यक्तिगत आजादी इतनी पसंद है कि वह उसे किसी भी कीमत पर, यहां तक कि प्यार पाने के लिए भी खोना नहीं चाहती। पिछली पीढी की स्त्री की तरह वह प्यार में अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार नहीं है। अब उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व है, उसकी अपनी पसंद-नापसंद, रुचियां और इच्छाएं हैं। उसे अपनी पसंद का साथी चुनने की पूरी आजादी है। ऐसी स्थिति में उसके पास विकल्पों की कमी नहीं है। उसके पास अपने आप को बदलने की कोई वैसी मजबूरी भी नहीं है, जैसी कि उसकी पिछली पीढी की स्त्रियों की हुआ करती थी कि एक बार किसी पुरुष के साथ शादी या प्रेम के बंधन में बंध जाने के बाद उसके पास अपने साथी अनुरूप खुद को ढालने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं होता था। पर आज वक्त के साथ स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसा नहीं है आधुनिक युवती अपनी शर्तो पर प्रेम करती है और अपने प्यार की खातिर खुद को बदलने के लिए जरा भी तैयार नहीं है। आज भी प्रेम के प्रति उसका समर्पण कम नहीं हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज उसकी जीवन स्थितियां उसके अपने नियंत्रण में हैं, वह जिससे प्यार करती है, उसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार है लेकिन वह अपनी निजी स्वतंत्रता को बरकरार रखना चाहती है। इसलिए उसे प्रेम या दांपत्य संबंध के मामले में भी थोडे-से पर्सनल स्पेस की जरूरत महसूस होती है। वह जिससे प्यार करती है, उसका केयरिंग होना तो उसे अच्छा लगता है, लेकिन उसे यह बात जरा भी पसंद नहीं आती कि उसका साथी उसे छोटी-छोटी बातों पर उसे रोके-टोके या उसकी पसंद-नापसंद पर अपनी मर्जी थोपने की कोशिश करें। शायद यह पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित व्यक्तिवादी सोच की ही देन है, जिसके अंतर्गत इंसान अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी की भी दखलंदाजी पसंद नहीं करता, चाहे वह उसका प्रेमी या जीवनसाथी ही क्यों न हो। भारतीय स्त्री भी इस विदेशी संस्कृति के इस प्रभाव से अछूती नहीं है। वह जिससे प्रेम करती है, उससे इस बात की उम्मीद रखती है कि वह उसकी व्यक्तिगत आजादी की भावना का सम्मान करे। इंजिनियरिग कॉलेज में पढने वाली 21 वर्षीया प्राची चुतमरानी कहती हैं, मेरी नजर में लाइफ पार्टनर को केयरिंग और नॉन इंटरफेयरिंग होना चाहिए। हर लडकी का व्यक्तिगत जीवन भी होता है और अपने दिन के चौबीस घंटों में से कम से कम दो घंटे वह अपने तरीके से जरूर बिताना चाहती है, जिसमें वह अपनी रुचि और पसंद से जुडे काम कर सके। मैं अपने साथ पढने वाले एक लडके से मैं प्रेम करती थी और वह भी मुझे बहुत चाहता था, हमने सोचा था कि पढाई पूरी होने के बाद हम शादी कर लेंगे। लेकिन धीरे-धीरे मुझे यह महसूस होने लगा कि वह मेरी निजी जिंदगी़ में जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी कर रहा है। वह चाहता था कि हर काम उससे पूछ कर करूं, उसकी पसंद के कपडे पहनूं, उसे मेरा कहीं आना-जाना, दूसरे लडकों से मिलना-जुलना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। ऐसी स्थिति में मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ऐसे इंसान के साथ जीवन बिताना बहुत मुश्किल है, जो मेरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान न करे। इस वजह से उस लडके से मेरा संबंध टूट गया। जिससे मैं बहुत प्यार करती थी, उससे संबंध टूटने पर मुझे बहुत दुख हुआ, पर मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं था। फिर भी धीरे-धीरे मैंने अपने आप को संभालना शुरू किया और अब मेरा जीवन सामान्य ढंग चल रहा है। मेरा मानना है कि कोई भी रिश्ता भी जिंदगी़ से बडा नहीं होता, जिंदगी़ के हर दौर में रिश्ते बनते-बिगडते रहते हैं।

प्रेम में अब नहीं है गैर बराबरी

समय में साथ भारतीय स्त्री शिक्षित, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही है और उसके व्यक्तित्व में यह बदलाव उसके संबंधों में भी देखने को मिलता है। साठ के दशक की प्रेम में समर्पित नायिका के मन में अपने साथी के प्रति-तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, जैसी भावना होती थी और वह अपने प्रेमी या पति के सामने अपनी निरीह स्थिति को खुशी-खुशी स्वीकार लेती थी। लेकिन पिछले तीस वर्षो से शिक्षित और जागरूक होने की वजह से उसमें आत्मविश्वास आया और वह घर-बाहर दोनों जगहों पर पुरुषों के साथ बराबरी के स्तर पर कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है। इस वजह से अब वह अपने की पुरुषों की तुलना में किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं समझती और आज के पुरुषों का नजरिया भी स्त्रियों के प्रति काफी बदला है। अब उन्हें भी कमजोर और लाचार के बजाय साहसी, आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी स्त्री ज्यादा प्रभावित करती है। इस वजह से आज का प्रेम संबंध भी बराबरी की भावना पर आधारित होता है। आज की स्त्री अपने प्रेमी या पति को भगवान मानने के बजाय अपनी ही तरह एक इंसान के रूप में देखती है। वह चाहती है कि उसका प्रेमी या पति भी उसकी भावनाओं को समझते हुए, उसके साथ दोस्ताना व्यवहार करे। इस संबंध में एक निजी कंपनी में कार्यरत निधि कहती हैं, जब मैं अपनी मां के दांपत्य जीवन की तुलना अपने जीवन से करती हूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि समय के साथ स्त्री-पुरुष के आपसी रिश्ते में काफी बदलाव आया है। पुराने समय में चाहे पति-पत्नी के बीच आपस में कितना ही प्यार क्यों न हो, लेकिन अपनी कमतर स्थिति को स्त्री सहजता से स्वीकारती थी। उसके मन में यह धारणा बनी हुई थी कि पुरुष हर हाल में स्त्री से श्रेष्ठ होता है। इस वजह से स्त्री को हर हाल में पुरुष का सम्मान करना चाहिए। मुझे याद है चाहे कितनी ही देर क्यों न हो जाए मेरी मां हमेशा पापा को खिलाने के बाद ही खुद खाती थीं और जीवन भर उन्होंने इस नियम को खुशी-खुशी निभाया। जीवन में उन्होंने छोटे-से-छोटा निर्णय भी पिता की सहमति/अनुमति के नहीं लिया। दिलचस्प बात यह है कि मेरे माता-पिता का प्रेम विवाह हुआ था और मैंने भी अपनी पसंद से शादी की है। लेकिन अपने पति के साथ मैं ऐसे संबंध की कल्पना भी नहीं कर सकती, जहां छोटी-छोटी बातों के लिए मुझे उनसे अनुमति लेनी पडे। हमारे संबंध सहज और दोस्ताना हैं, मैं अपनी मां की तरह खाने के लिए पति का बहुत देर तक इंतजार नहीं कर सकती, अगर शाम को उन्हें घर आने में देर हो तो मैं बच्चों के साथ डिनर कर लेती हूं और मेरे पति इस बात के लिए जरा भी बुरा नहीं मानते।

बदली है नई पीढी की स्त्री की सोच

प्यार के प्रति स्त्री का नजरिया वक्त के साथ बदला है क्योंकि स्त्री शिक्षित होती चली गई, उसका अपना स्वतंत्र वजूद होता गया। आज के युग की स्त्री की जीवन में प्यार की अहमियत जरूर है, पर वो उस प्यार को तवज्जो देती है जो प्यार उसे शादी के बाद मिलता है। प्यार के मामले में स्त्री का दृष्टिकोण इसलिए बदल गया है, क्योंकि शिक्षित होने की वजह उसके जीवन की दिशा बदल गई है। वह जान चुकी है कि प्यार उसके जीवन का अंतिम लक्ष्य कभी नहीं बन सकता। आज की स्त्री अपने अनुभवों सीख चुकी है कि प्यार से अधिक महत्वपूर्ण है करियर और जीवन का उद्देश्य है। प्यार के रिश्ते में स्त्री का आत्मसम्मान बेहद महत्वपूर्ण होता है पर इस बात को केवल नई पीढी की स्त्री ही समझ सकती है। क्या बरसों पहले कभी किसी ने यह बात गौर किया था? हजारों प्रेम कहानियां हकीकत में बदल चुकी हैं, रोज ऐसा होता है, पर शायद ही कोई स्त्री के आत्मसम्मान की रक्षा के बारे में सोचता है। आज के दौर में स्त्री की तरफ से रिश्ते उस वक्त टूटते-बिखरते है जब उसके आत्मसम्मान को बार-बार ठेस पहुंचती है। गुजरे जमाने में स्त्री सिर्फ आत्मसमर्पण जानती थी। पुराने समय में रिश्ते इसलिए बने रहते थे क्योंकि स्त्री अपने जीवनसाथी के अत्याचारों को चुपचाप सहती रहती थी। आज की स्त्री को पता है कि जीवन में उसका अपना वजूद है, जिसने उसे आत्मसम्मान दिलाया है और इसे बचाए रखना उसकी अपनी जिम्मेदारी है।

स्त्री चाहती है अपनी भावनाओं का सम्मान भी

प्यार इंसान को भावनात्मक मजबूती देता है और उसे जिंदगी़ जीना सिखाता है। प्यार के प्रति आधुनिक स्त्री का नजरिया बदला जरूर है, पर प्रेम को लेकर जो मूल बातें हैं, उनमें कोई बदलाव नहीं आया है। एक-दूसरे के प्रति गहरे विश्वास और समर्पण की भावना आज भी देखने को मिलती है। अगर प्रेम के मामले में ये बुनियादी बातें न हों तो वह प्रेम सच्चा प्रेम नहीं कहा जा सकता। प्यार में कोई भी स्त्री कम से कम इतना तो जरूर चाहती है कि उसका साथी उसकी भावनाओं को समझे और उनका सम्मान करे। अगर दो लोगों के बीच सच्चा प्यार हो तो दोनों एक-दूसरे के व्यक्तित्व की खामियों को नजरअंदाज कर देते हैं और ऐसा करना जरूरी भी है क्योंकि प्यार में स्थायित्व ऐसा करके ही आ सकता है। प्रेम और दांपत्य संबंधों के प्रति आधुनिक भारतीय स्त्री का दृष्टिकोण पहले की तुलना में काफी बदलाव आया है। आज की स्त्री आजाद और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है, इस वजह से वह अपना भी खयाल रखना और अपने आप से भी प्यार करना सीख गई है। अब वह पहले की तरह अपनी सभी इच्छाओं और रुचियों का त्याग नहीं करती, बल्कि वह अपने व्यक्तित्व के गुणों को भी निखार कर अपने जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करती है। चाहे प्रेम हो या शादी दोनों ही स्थितियों में वह अपनी तरफ से सामंजस्य स्थापित करने की पूरी कोशिश करती है, पर वह अपने आप को मिटा कर एडजस्टमेंट नहीं करती।

स्त्री पहचानने लगी है भावनात्मक जरूरतें

समय के साथ बदलाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी वजह प्यार को लेकर भारतीय स्त्री का नजरिया भी पहले की तुलना में काफी बदल गया है। आधुनिक स्त्री शिक्षित और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है, इस वजह से अब वह अपनी जिंदगी़ की भावनात्मक जरूरतों को पहचानने लगी है। आज से बीस साल पहले इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि प्रेम में कोई लडकी खुद किसी लडके को प्रोपोज करे लेकिन आज की लडकी किसी लडके के सामने अपनी भावनाओं का इजहार करने में नहीं झिझकती। पर आधुनिक स्त्री आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से पूर्ण है, इस वजह से वह अपने रिश्तों में आत्मसम्मान को अहमियत देती है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, प्यार के मामले में दोनों में से किसी को भी डबल स्टैंडर्ड नहीं होना चाहिए और अपने रिश्ते के प्रति दोनों को ईमानदारी बरतनी चाहिए। दरअसल जब दो इंसानों के बीच सच्चा प्यार होता है तो व्यक्तित्व की थोडी-बहुत खामियों के बावजूद एक-दूसरे के साथ बिना किसी परेशानी के एडजस्मेंट हो ही जाता है।

व्यावहारिक हो चुकी है आधुनिक स्त्री

प्रेम बेहद खूबसूरत एहसास है, जो दो इंसानों के अहं को समाप्त कर उन्हें एक-दूसरे के साथ लयबद्ध कर देता है। भारतीय स्त्री में प्रेम के बदले कुछ पाने की उम्मीद रखने के बजाय अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार रहती है। प्रेम को लेकर भारतीय स्त्री के दृष्टिकोण में कोई खास बदलाव नहीं आया है। ईश्वर ने स्त्री को जन्मजात रूप से भावुक बनाया है पर आज उसे घर-बाहर की िजम्मेदारियां साथ-साथ निभानी पडती हैं, इस वजह से उसका व्यक्तित्व बाहर से सख्त प्रतीत होता है जो कि असल में उसका मूल रूप नहीं है। प्यार में कोई हिसाब-किताब नहीं होता। प्रेम का नाम है एक हो जाना। सच्चे प्रेम में अपने साथी से कुछ पाने के बजाय उसे देने की इच्छा अधिक होती है। आज का प्रेम भौतिकतावादी हो चुका है और युवा पीढी प्रेम में भावनाओं से ज्यादा सेक्स को अहमियत देने लगी है। आज की लडकियां प्रेम करने से पहले लडके का दिल नहीं बल्कि उसका बैंक बैलेंस देखती हैं। पुराने समय की तुलना में आज की स्त्री प्रेम के मामले में व्यावहारिक हो चुकी है। यह एक तरह से स्वाभाविक भी है, क्योंकि आज की अति व्यस्त जिंदगी़ में समाज और स्थितियां तेजी से बदल रही हैं, ऐसे में स्त्री का बदलना भी स्वाभाविक है। मेरा मानना है कि प्रेम में किसी भी इंसान को अपने साथी को उसके व्यक्तित्व की कमजोरियों के साथ स्वीकारना चाहिए। पर किसी स्त्री के जीवन में उसका आत्मसम्मान बहुत अहमियत रखता है। अगर वह खो ही गया तो फिर उसके पास बचेगा क्या? आत्मसम्मान से ही कोई स्त्री अपनी पहचान बना सकती है। आत्मसम्मान के बिना तो कुछ भी संभव नहीं।

बहुत बदला है स्त्रियों का नजरिया
प्यार हमें जीवन जीने का एक मकसद देता है। एक स्त्री के जीवन में भी प्यार बहुत मायने रखता है। प्यार में इतनी ताकत होती है कि वह हिंसक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति को भी समझदार इंसान बना देता है। आज के दौर में प्यार के प्रति स्त्रियों का नजरिया वाकई बदल गया है। यह बदलाव जरूरी है ताकि किसी स्त्री को प्यार के नाम पर जीवन भर विश्वासघात सहना न पडे। आज स्त्री दूसरों को मौका नहीं देती कि वे उसके प्यार का अफसाना बनाएं। जो स्त्री पहले अपने प्यार को मन में दबाए और छिपाए अपना पूरा जीवन गुजार देती थी, वही आज पूरी तरह बदल गई है। आज काफी हद तक स्त्री अपने प्रेम का इजहार आसानी से कर लेती है। आज कोई युवती किसी से प्रेम करती है तो अपने साथी से कोई विशेष अपेक्षाएं नहीं रखती लेकिन उनके लिए ईमानदार और अच्छे चरित्र वाला पुरुष होना बहुत जरूरी है। वग उससे यही अपेक्षा रखती है कि वह जीवन भर उसके साथ अपने रिश्ते के प्रति ईमानदार रहे। मुम्बई की  फ़ैशन माडल सारा के अनुसार - जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो उसके बारे में इतना तो जानते ही हैं कि वह स्वभाव से कैसा, देखने में कैसा और कितना केयरिंग है, स्त्रियों के प्रति उसका क्या नजरिया है और वह दूसरों का कितना सम्मान करता है। फिर कोई व्यक्ति जो इस दुनिया में आया है वह परफेक्ट नहीं होता है। अगर होता है तो यह समझिए कि वह इंसान नहीं भगवान है। इसलिए हर किसी में कुछ न कुछ कमियां तो होती ही हैं। मुझमें भी हैं। जब मेरे पार्टनर ने मुझे मेरी बुराइयों-अच्छाइयों के साथ स्वीकारा है तो मैं भी उसकी कमियों को नजरअंदाज करती हूं। ऐसा नहीं है कि एडजेस्टमेंट सिर्फ स्त्री ही करती है, पुरुष भी करता है। यह एक स्त्री की खूबी होगी कि वह अपने जीवनसाथी की बुराइयों को अच्छाइयों में बदल दे। एक स्त्री के लिए आत्मसम्मान उसके जीवन भर की पूंजी है। अगर वही खत्म हो गई तो उसके जीवन में बचेगा क्या? लेकिन यहां मैं यह भी मानती हूं कि मुझसे सच्चा प्यार करने वाला व्यक्ति कभी भी मेरे आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुंचा सकता। प्यार में कभी दिल मेरा भी दिल टूटा है, लेकिन मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा कि अब उसके बिना मेरा जीवन बेकार हो गया। एक समझदार स्त्री संबंध खत्म होने के बाद खुद को संभाल सकती है। वह कभी यह नहीं सोचेगी कि उसका जीवन ही खत्म हो गया। जब दूसरा दिल तोडकर चला गया तो उसकी याद में वह अपनी जिंदगी़ क्यों तबाह करे? बल्कि उससे सबक लेकर नए सिरे से जीवन शुरू करना चाहिए। यही तो जीवन के अनुभव हैं। जब ठेस लगती है तभी तो व्यक्ति आगे संभल कर कदम रखता है। प्यार नहीं तो क्या हुआ और रिश्ते भी तो होते हैं। इंसान को हर हाल में खुश रहना चाहिए।

प्रेम का बाजारीकरण कहां तक हावी    
ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में सामाजिक संबंधों में लचीलापन आया है, लडकियों के बाहरी दुनिया में कदम रखने के कारण उन्हें थोडी आजादी भी मिली है। बाजार ने भी प्रेम की इस भावना को भुनाने में कसर नहीं छोडी है। शायद इसलिए वेलेंटाइन डे जैसे दिवस मनाने की परंपरा चल निकली है। फरवरी आते ही तमाम ब्रैंड्स प्रेम की इस भावना को भुनाने की पुरजोर कोशिशों में जुट जाते हैं। ग्रीटिंग का‌र्ड्स, गिफ्ट्स, चॉकलेट्स, सॉफ्ट टॉयज और फूलों से बाजार पटने लगते हैं। प्रेम के इस त्योहार का युवा वाकई मन से स्वागत करते हैं या फिर इसे लेकर वे कुछ अलग सोचते हैं। वेलेंटाइन डे एक फैशन बन चुका है। प्रेम नितांत निजी भावना है और इसका बाजारीकरण गलत है।

 

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