खतरनाक है आत्ममुग्धता

 

फ्रायड के अनुसार हम एक व्यक्ति के रूप में अपने होने के बोध या अहंकार के साथ नहीं जन्मे हैं। अहंकार समय के साथ-साथ हममें भरता जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे संपर्क के प्रभाव से आता है। माता-पिता के नियंत्रण और उनकी अपेक्षाओं, सामाजिक वातावरण और अपने स्तर के बारे में उनकी सीख का इस पर पूरा प्रभाव होता है।

 
वह इसे ईगो लिबिडो यानी आत्मरति कहते हैं। वह यह भी कहते हैं कि आत्मरति को वस्तुरति यानी ऑब्जेक्ट लिबिडो से साफ तौर पर अलग करके नहीं देखा जा सकता है। वैसे ऑब्जेक्ट लिबिडो का कारण व्यक्ति स्वयं नहीं, उसके परिवेश की वे चीजें होती हैं जिनसे वह अपनी तुलना करने लगता है। तुलना की यह प्रक्रिया जब बहुत बढ जाती है और व्यक्ति कई स्थितियों में स्वयं को हीन महसूस करने लगता है तो वह एक अति की ओर बढने लगता है।
 

यह अति ही सेकेंडरी नार्सीसिज्म है। यह इसका पैथोलॉजिकल कंडीशन है। जब कोई स्वयं को किसी की तुलना में हीन समझता है तो वह या तो समाज से बचने लगता है या आडंबर ओढने लगता है। जब उसे लगता है कि उसकी असलियत जाहिर हो सकती है, वह रक्षात्मक हो जाता है। यदि शक्तिसंपन्न हुआ तो रक्षा का यह तरीका डांट-फटकार और कमजोर हुआ तो उलाहनों, रोने व नकारात्मक सोच के रूप में सामने आता है। एक और उपाय भी लोग अपनाते हैं, रक्षा कवच बनाने का।

 खुशामदी लोग रक्षा कवच का ही काम करते हैं। ये कभी सहयोगियों के रूप में होते हैं तो कभी मित्रों और कभी परिवार के सदस्यों के रूप में भी।
वैसे दोनों ही स्थितियों में इसे पर्सनालिटी डिसॉर्डर माना जाता है। फ्रायड के अलावा कुछ अन्य मनोवैज्ञानिकों ने भी इस पर काम किया है। इनमें कारेन हॉर्नी, हायंज कोहट, अट्टो कर्नबर्ग के नाम प्रमुख हैं। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से संबद्ध वायल मेडिकल कॉलेज में साइकेट्री के प्रोफेसर रॉबर्ट बी मिलमैन इसके एक अन्य रूप का िजक्र करते हैं। यह है एक्वायर्ड सिचुएशनल नार्सीसिज्म। नार्सीसिज्म का यह वह रूप है जो अपेक्षाकृत बडे लोगों यानी वयस्क और संपन्न लोगों को शिकार बनाता है। इसकी आशंका ऐसे लोगों में ज्यादा होती है, जिनकी व्यस्तता ऐसे समाज में अधिक होती है जहां मशहूर हस्तियों का खास प्रभाव होता है। हस्तियों के बारे में जानते व सोचते रहने से वे जाने-अनजाने उनके जैसा बनने की कोशिश करने लगते हैं। उनकी चमक-दमक के पीछे भरे अंधेरे से अनजान लोग सेलिब्रिटीज की नकल करते हुए स्याह अंधेरे की ओर बढने लगते हैं। उन्हें वह शोहरत हासिल हो न हो, पर वे हर शख्स से अपने प्रति वैसा ही विशिष्ट व्यवहार चाहने लगते हैं। वैसा ही सम्मान, वैसी ही प्रशंसकों की भीड चाहे यह सब फर्जी ही क्यों न हो। आम आदमी से भिन्न दिखने की यह चाह ही जानलेवा हो जाती है।

आत्ममुग्धता के कुछ लक्षण -

1. आत्ममुग्ध लोग अपनी आलोचना बिलकुल नहीं बर्दाश्त कर सकते। मामूली आलोचना से भी वे बुरी तरह नाराज हो सकते हैं और मारपीट तक पर उतर सकते हैं।

2. दूसरों से ये समानता के संबंध नहीं बनाते, सिर्फ उनका इस्तेमाल करते हैं।

3. अपना महत्व बढा-चढा कर बताने और दिखाने की कोशिश करते हैं।

4. अपनी बौद्धिक क्षमता, समझ, सुंदरता, रोमानियत, अधिकारों और उपलब्धियों को भी लेकर निरर्थक व निराधार कल्पनाएं करते रहते हैं तथा उन कल्पनाओं को ही सच मानते हैं।

5. हर जगह अति विशिष्ट व्यक्ति जैसा सम्मान चाहते हैं। इसके लिए निरर्थक प्रदर्शन तो करते ही हैं, बिना सोचे-समझे झूठ भी बोलते हैं।

6. बहुत छोटी-छोटी बातों से ही वे ईष्र्या के शिकार होने लगते हैं।

7. हर कार्य का श्रेय खुद लेने का प्रयास करते हैं, चाहे वह निचले स्तर का क्यों न हो।

8. निजी संबंधों के मामले में वे भावनात्मक शोषण करने वाले होते हैं।

9. समानता के खयाल से भी डरते हैं। दूसरों की तुलना में अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बेवजह शेखी बघारते हैं।

10. हर बात पर अडियल रवैया दिखाते हैं और मामूली बात पर भी नाराज हो जाते हैं।

11. नार्सीसिस्ट अगर वास्तव में अधिकार संपन्न हुआ तो वह दूसरों की बात कभी नहीं मानेगा। उलटे सबसे अपनी धारणा का केवल समर्थन चाहेगा।

 

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