स्रियों के आभूषण या गहनों का वर्गीकरण

 

आभूषण लोकसंस्कृति के लोकमान्य अंग हैं । सौंदर्य की बाहरी चमक-दमक से लेकर शील की भीतरी गुणवत्ता तक और व्यक्ति की वैयक्तिक रुचि से लेकर समाज की सांस्कृतिक चेतना तक आभूषणों का प्रभाव व्याप्त रहा है । आभूषणों के उपयोग का प्रभाव तन और मन, दोनों पर पड़ता है । उनके धारण करने से शरीर का सौंदर्य ही नहीं प्रकाशित होता, वरन् स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहता था ।

 
 
 

सौंदर्य-बोध में उचित समय पर उचित आभूषण पहनने का ज्ञान सम्मिलित है । शरीर-विज्ञान के आधार पर ही आभूषणों का चयन किया गया है । पायल और कड़े धारण करने से एड़ी, टखनों और पीठ के नितले भाग में दर्द नहीं होता । ज्योतिषविदों ने ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव से आभूषणों के प्रभाव का संबंध स्थापित कर एक नयी दिशा खोली है । ग्रहों के बुरे प्रभाव को निस्तेज करने के लिए निचित धातुओं और रत्नों का चयन और आभूषणों में उनका प्रयोग महत्त्वपूर्ण खोज है ।

शील की पहचान का एक उदाहरण लक्ष्मण के इस कथन से मिलता है कि "नाहं जानामि केयुरे नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादा वन्दनातु ।।" (न तो मैं इन बाजूबन्दों को जानता हूँ और न इन कुण्डलों को, लेकिन प्रतिदिन भाभी के चरणों में प्रणाम करने के कारण इन दोनों नूपुरों को अवय पहचानता हूँ ।) आभूषणों से नारी की रुचि का पता चलते ही है, तत्कालीन आर्थिक और सामाजिक स्थिति की भी पहचान हो जाती है । यदि प्राचीन समय में पैरों में स्वर्णाभूषण या रत्नजटित आभूषण पहने जाते थे, तो तत्कालीन समृद्धि का पता लगा जाना स्वाभाविक है । किसी परिवार की नारी के आभूषणों से उसके स्तर का ज्ञान हो जाता है । कुछ आभूषण सौभाग्य के प्रतीक रुप में मान्य हैं, जिन्हें देखकर परिणीता स्री की पहचान हो जाती है । आभूषणें से जूड़े लोकविश्वास लोकसंस्कृति के अवयव हैं । बिछिया बदलने के लिए अच्छे दिन चुने जाते हैं । लोकोत्सवों और पूजा में आभूषण शुभत्व के प्रतीक हैं । संक्षेप में, जीवन के सुख-दु:ख के साथ आभूषणों का सार्थक जुड़ाव रहा है । कैकेयी कोप-भवन में जाकर लाखों की लागत के मोतियों के हार तथा सुंदर बहुमूल्य आभूषण अपने अंगों से उतारकर फेंक देती है (रामायण, २/९/५६), जबकि सीता पति के हाथ की मुद्रिका पाकर इतनी प्रसन्न होती है, मानो उनके पतिदेव ही उन्हें मिल गयो हों (रामायण, ५/३६/४) । इसी तरह के उदाहरण लोकगीतों और लोकगाथाओं में मिलते हैं ।

वर्गीकरण

शास्रीय दृष्टि से बारह आभरण माने गये हैं, जो बारह अंगों को आभूषित करते हैं । आंगिक सौंदर्य के साधन होने के कारण कवियों ने उनका वर्णन नखशिख के अंतर्गत किया है । बलभद्र मिश्र, केशव, खुमान, प्रतापसाहि आदि इस क्षेत्र के रीतिकवियों ने ख्यात नखाखि ग्रंथों की रचना की है और इस परंपरा में बुंदेलखंड का योगदान महत्त्वपूर्ण रहा है । इसी तरह लोककवियों ने भी आंगिक सौंदर्य और आभूषणों के वर्णनों में काफी रुचि दिखाई है । फागकारों, सैरकारों और फड़काव्य के कवियों ने आभूषणों पर रचनाएँ रची है, जो या तो वर्णन प्रधान हैं या प्रभावात्मक । यहाँ कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं-

 
१. बेनी भाल माँग श्रुत नासिका के 'बलभद्र'
कंठ के कनक के सुबरन अपार हैं ।
भुज पुहिचाँनि कर पल्लव के कौन गनै,
उरन के मंडन जिते हमेल हार हैं ।
कटि मुरवान के सुहायन कों आँगुरी के,
बिछिया आदि दैकें जितकौ झनकार हैं ।
चीर मन-धातुर सुगंध बार अलंकार,
बारह आभरन ये सोरह सिंगार हैं ।

२. बिछिया अनौट बाँके घुँघुरु जराय जरी,
जेहरि छबीली छुद्रघंटिका की जालिका ।
मूँदरी उदार पौंची कंकन वलय चूरी,
कंठ कंठमाल हार पहरे गुपालिका ।
बेनीफूल सीसफूल कर्नफूल माँगफूल,
खुटिला तिलक नकमोती सोहैं बालिका ।
'केसवदास' नीलवास ज्योति जगमग रही,
देह धरे स्याम संग मानो दीपमालिका ।

 

पहले उदाहरण में बारह आभरण और सोलह श्रृंगार कहे गये हैं और उन बारह आभरण को शरीर के अंगों से संबद्ध कर दिया गया है । दूसरे उदाहरण में प्रमुख आभूषणों की सूची दी गयी है । लेकिन कवि ने 'नखाखि' में अंगों के क्रम को ही प्रधानता दी है । इसी तरह लोककवियों ने भी आंगिक क्रम से आभूषणों का वर्णन सुविधाजनक माना है । लेककविता में तो आभरण सौंदर्य के खास माध्यम हैं । ईसुरी ने स्वय कहा है-'दुर से नौनी लगत जा मुइयाँ, भलो पैर लओ गुइयाँ ।'गहने

गहनों का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया जा सकता है । १. गक आधार पर स्रियों और पुरुषों के गहने अलग-अलग विभाजित किये जा सकते हैं, २. जाति की दृष्टि से कई वर्ग बनते हैं, जैसे आदिवासियों के, काछियों के, ढीमरों, चमारों, लोधियों आदि के आभूषण, ३. आंगिक क्रम से, जैसे-पैर के, कटि के, कौंचा, बाजू, नाक, कान आदि के आभूषण । पहले प्रकार में तीन वर्ग आते हैं । १. स्रियों के आभूषण, जो प्रमुख महत्त्व के हैं, २. पुरुषों के आभूषण, जिनका प्रचलन कम है, ३. बालकों के आभूषण, जिनका प्रचलन कम हो रहा है । दूसरे प्रकार में कई वर्ग बनते हैं, लेकिन उनके आधार पर आभूषणों का निर्धारण कठिन हो जाता है । उदाहरण के लिए, गोंडों में प्रचलित पटा बहुँटा, चुटकी, हमेल और बारी अन्य वर्गों या जातियों में भी पहने जाते हैं । लेकिन सतुवा, ढार, झरका उन्हीं के नाम हैं । कोंदरों में टोडर, चंदौली और टकार हैं, जो अन्य वर्गों में प्रचलित नाम नहीं हैं । विमुक्त जातियों में आभूषणों के प्रति लगाव है, पर आर्थिक स्थिति बाधा के रुप में खड़ी रहती है । साँसी और बेड़िया स्रियों का सौंदर्य वैसे ही आकर्षक है, पर आभूषणों के कारण कई गुना बढ़ जाता है । पारधी स्रियाँ नाक-कान नहीं छिदातीं और मस्तक पर सुहाग के प्रतीक आभूषण धारण नहीं करतीं । मोघिया स्रियाँ भी सुंदर होती हैं, पर वे मस्तक पर टीका, गले में माला और नाक में लोंग पहन कर सुंदरता को चुनौती देने लगती हैं । ढीमर स्रियाँ नाक नहीं छिदातीं । गड़रियों की स्रियाँ कोनी (कुहनी) के ऊपर टँड़ियाँ पहनती हैं, जबकि लोधी स्रियाँ पैरों में घुंसी धारण करती हैं । मतलब यह है कि गहनों से ही जाति की पहचान हो जाती थी । अब तो सभी जातियों ने एक दूसरे से गहने अपना लिये हैं । मुसलमान स्रियों की नथ सबको भाने लगी है, पर बुलाक (तुर्की) को एकादि ने ग्रहण किया है । इन भिन्नताओं के कारण जाति की दृष्टि से आभूषणों का विभाजन उचित नहीं है ।

स्पष्ट है कि आंकिक क्रम से वर्गीकरण सुविधाजनक है और उसे ही यहाँ केन्द्र में रखा गया है । वर्गीकरण निम्न प्रकार है

(क) स्रियों के आभूषण-१. पैर की अँगुलियों के आभूषण २. पैर के गहने ३. कटि के आभूषण ४. हाथ की अँगुलियों के आभूषण ५. कौंचा के ६. कोनी के, ७. बाजू के ८. कण्ठ के ९. कान के १०. नाक के ११. माथे के १२. माँग के १३. सिर के १४. बेनी के ।

(ख) पुरुषों के आभूषण-१. पैर के २. हाथ के ३. गले के ४. कान के ।

(ग) बालकों के आभूषण-१. पैर के २. हाथ के ३. गले के ४. कटि के ५. कान के ।

(घ) वस्रों में टाँकने वाले आभूषण-१. घूँघट के २. पल्ला के अथवा आँचर के छोर के ३. फरिया के ।

 

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