गर्भ कैसे ठहरता है? गर्भाधान या फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया क्या है?

गर्भ की प्रक्रिया समझने के लिये स्त्री के प्रजनन अंगों को समझना जरुरी है। स्त्री के प्रजनन अंगों को चार भागों में बांटा गया है- ओवरी, डिम्बवाहिनी नली, गर्भाशय और योनि। ओवरी बादाम की तरह और लगभग उसी के आकार की दो ग्रथियां होती हैं। स्त्रियों में मौजूद इन्हीं ओवरियों में मनुष्य को जन्म देने वाले लगभग चार लाख जीवित अण्डे किशोरावस्था के आने तक सुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं। प्रथम मासिक-धर्म के शुरू होते ही इस बात की सूचना मिल जाती है कि लड़की अब किशोरी हो गई है। इसके साथ ही उसके संपूर्ण संतानोत्पादक अंग सचेत होकर अपने-अपने कार्य में जुड़ जाते हैं। किशोरावस्था के आरंभ होते ही ओवरी में सोए हुए अंडे सचेत होकर बाहर निकलने का प्रयास करने लगते हैं। साधारणः लगभग 28 दिनों के अंतराल से दोनों ओवरियों में से किसी एक ओवरी में एक साथ कई अंडे पकने शुरू हो जाते हैं, लेकिन अंतिम रूप से केवल एक ही अंडा पककर बाहर निकलने योग्य हो पाता है, बाकी सब सूखकर बेकार हो जाते हैं।

 
 
 

मासिक धर्म के बाद लगभग 10 दिनों तक यह अंडा ओवरी के अंदर अपनी छोटी सी पुटिका में बंद होकर पुटिका सहित बढ़ता रहता है। अंत में यह ओवरी के ऊपरी सतह पर उभरकर एक छोटा सा छाला बनकर दिखता है। पक जाने पर यह पुटिका फट जाती है और पका हुआ अंडा ओवरी से अलग हो जाता है। स्त्री की संपूर्ण आयु में लगभग 30 वर्षों तक प्रति माह एक अंडा (डिम्ब) ओवरी से बाहर निकलता है। इस प्रकार ओवरी के अंदर कुल चार लाख अंडों में से केवल 400 या 445 अंडे ओवरी से बाहर निकलते हैं। बाकी अंडे पूरी तरह न पक सकने के कारण नष्ट हो जाते हैं या उनके पकने की कभी बारी ही नहीं आती।

यह निश्चित करना असंभव है कि किस ओवरी से अंडा पककर बाहर निकलेगा। एक माह में दोनों ओवरियों से साथ-साथ अलग-अलग अंडे पककर निकल सकते हैं। प्रत्येक ओवरी के निकट ऊपर की ओर मांस की एक पतली सी नली होती है- लगभग साढ़े पांच इंच लंबी। इसे डिम्बवाहिनी नली या फेलोपिन ट्यूब कहते हैं। इन नलियों का एक-एक सिरा ओवरी के समीप होता है। इसके साथ ही इन सिरों में से अनेक रेशे जैसे लटकते रहते हैं। इन नलियों के दूसरे सिरे कुछ पतले होकर गर्भाशय के ऊपर की ओर आकर दाएं-बाए मिल जाते हैं। ओवरी से ज्यों ही पका हुआ अंडा बाहर निकलता है, डिम्बवाहिनी के सिरे पर झूमते हुए रेशे उस अंडे को हाथी की सूंड की तरह पकड़कर नली के मुख छिद्र में डालकर अंदर धकेल देता है।
          अब यह डिम्ब लहराती हुई नली से रोमाभ (रोम की तरह बाल के रेशे) की पकड़ में आ जाता है। यह रोमाभ इस नए मेहमान को आदर सहित धीरे-धीरे धकेलकर नली के दूसरी ओर गर्भाशय में प्रवेश कराने के लिए आगे बढ़ाते रहते हैं। डिम्बवाहिनी नली की यात्रा पूर्ण करने में प्रायः 3 से 6 दिन तक का समय लग सकता है। ओवरी के अंदर रहकर ज्यों-ज्यों अंडे का विकास होता रहता है, स्त्री की कामवासना दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है। जिस दिन डिम्ब, ओवरी को फोड़कर बाहर निकलता है, उस दिन विशेष रूप से कुछ अधिक बेचैनी अनुभव होती है जो प्रायः 2-3 दिन में ठंडी पड़ जाती है।
इसका कारण यह है कि पके हुए अंडे यानी डिम्ब में पूर्णता प्राप्त करने के लिए पुरुष के वीर्य में उपस्थित स्पर्म से मिलने की इच्छा होती है जो स्त्री की कामुक भावना से स्पष्ट होती है। मासिक-धर्म के प्रायः 10 दिन बाद डिम्ब ओवरी से बाहर निकलता है जिसे ओवूलेशन क्रिया कहते हैं। इस दिन यदि वह स्त्री किसी पुरुष से समागम करती है तो पुरुष के वीर्य में उपस्थित करोड़ों स्पर्म किसी न किसी तरह गर्भाशय के मुख छिद्र में प्रवेश कर ऊपर डिम्बवाहिनी नलियों में पहुंच कर वहां पहले से उपस्थित पके हुए डिम्ब से मिल जाने का प्रयत्न करते हैं। इन शुक्राणुओं का शरीर बहुत सूक्ष्म धागे की तरह होता है। इसके 2 भाग होते हैं- एक सिर तथा दूसरा पूंछ।
          यह शुक्राणु इतने छोटे और चंचल होते हैं कि इनके लिए 5 या 6 इंच की यह छोटी सी यात्रा कठिन प्रतीत होती है। इस कठिन परिस्थिति में एक शुक्र के शायद जीवित बचने की आशा करना व्यर्थ है। इस बात को ध्यान में रखकर प्रकृति भी इस कठिनतम परीक्षा के लिए एक साथ करोड़ों शुक्राणुओं को निमंत्रण देती है। जीवन-मरण की इस दौड़ में शायद एक या दो शुक्राणु सफल हो पाते हैं क्योंकि योनि से लेकर डिम्बवाहिनी नली तक के मार्ग में अनेक बाधाएं इन नन्हे यात्रियों के प्राण ले लेती हैं।
          सबसे पहले समागम के समय ही योनि के अंदर चारों तरफ की दीवारों में छिपी ग्रंथियों से एक तरल व चिकना पानी जैसा द्रव निकला करता है। इस द्रव में तेजाब के गुण होते हैं। वीर्य के साथ जो शुक्राणु योनि में आ जाते हैं, उन्हें यहां आते ही सबसे पहले तेजाब सागर में गोते लगाने पड़ते हैं जिससे अधिकांश शुक्राणु तो यहीं मौत के घात उतर जाते हैं जो थोड़े बहुत किसी तरह जीवित बच जाते हैं, वे शीघ्रता से गर्भाशय के मुख छिद्र द्वारा अंदर प्रवेश कर जाते हैं। इन शुक्राणुओं को डिम्बवाहिनी नली तक पहुचने के लिए चारों ओर चिपचिपी दीवार, पहाड़-पहाड़ियों की तरह उभरी हुई मांस की गद्दियों और चिपचिपे तरल पदार्थों की झीलों को पार करना पड़ता है।
          इस शुक्राणुओं को अंडे तक पहुंचने में डेढ़-दो दिन का समय लग जाता है। यदि ओवूलेशन क्रिया के बाद के 1-2 दिन में ही स्त्री किसी पुरुष से मिलाप नहीं कर पाती तो गर्भाधान का प्रश्न नहीं उठता, क्योंकि बाद में डिम्ब में अपनी नली से निकलकर गर्भाशय में पहुंचकर शुक्राणुओं से मिलने की शक्ति नहीं रहती। जैसे ही कोई शुक्राणु नली के इस छोर पर इंतजार करते हुए अंडे के पास पहुंचता है, वैसे ही वे दोनों अपनी परस्पर आकर्षक शक्ति के कारण इतनी व्याकुलता और व्यग्रता से आलिंगन करते हैं कि देखते ही नन्हा-सा शुक्राणु अपने तीर जैसे नुकीले सिरे को डिम्ब की खाल में गड़ाकर किसी तरह घूम-घूमकर दीवार में छेद करता हुआ अंदर घुस जाता है। अंडा शुक्राणु को अपने में आत्मसात कर लेता है। बस इस क्रिया को गर्भाधान या अंग्रेजी में फर्टिलाइजेशन कहते हैं। अब इस गर्भित अंडे में अनेक नए परिवर्तन होने लगते हैं और तब यह अंडा शीघ्रता से एक जगह जमकर बैठने के लिए उपयुक्त स्थान की खोज करता हुआ डिम्बवाहिनी नली से बाहर निकलकर गर्भाशय में प्रवेश करता है।
          गर्भाशय के चारों ओर मुलायम मांस की रस भरी गद्दियां बनकर बिछ जाती हैं ताकि गर्भिक अंडे को कहीं भी जमकर अंकुरित होने की सुविधा मिल सके। इसके अतिरिक्त ओवरियों को भी गर्भाधान की सूचना तुरंत मिल जाती है। जिससे इन ओवरियों में अगले 9 महीने अंडे का पककर निकलना बंद हो जाता है और न ही कोई शुक्राणु अंदर आ पाता है। मासिक-धर्म का क्रम भी रुक जाता है। स्त्री गर्भवती हो जाती है।

 

 

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